Tuesday, June 3, 2014

English Short Jokes

Boss: Where were you born?
Sardar: India ..
Boss: which part?
Sardar: What 'which part'? Whole body was born in India .

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2 sardar were fixing a bomb in a car.

Sardar 1: What would you do if the bomb
explodes while fixing.
Sardar 2: Dont worry, I have one more.

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Sardar: What is the name of your car?

Lady: I forgot the name, but is starts with 'T'.
Sardar: Oh, what a strange car, starts with Tea. All cars that I know start with petrol.

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Sardar joined new job. 1st day he worked till late evening on the computer. Boss was happy and asked what you did till evening.

Sardar: Keyboard alphabets were not in order, so I made it alright.

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At the scene of an accident a man was crying: O God! I have lost my hand, oh!

Sardar: Control yourself. Don't cry. See that man. He has lost his head. Is he crying?

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Sardar: U cheated me.

Shopkeeper: No, I sold a good radio to u.
Sardar: Radio label shows Made in Japan but radio says this is 'All India Radio! '

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NOW THE LAST TWO ULTIMATE:

In an interview, Interviewer: How does an electric motor run?
Sardar: Dhhuuuurrrrrrrrrr. .....
Inteviewer shouts: Stop it.
Sardar: Dhhuurrrr dhup dhup dhup...

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Tourist: Whose skeleton is that?
Sardar: An old king's skeleton.
Tourist: Who's that smaller skeleton next to it?
Sardar: That was same king's skeleton when he was a child

Sunday, June 1, 2014

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' फ्रांस ने दी?


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अमेरिकी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर 1876 में फ्रांस की तरफ से स्मारक के तौर पर अमेरिका को स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी भेंट किया गया था। यह स्टेच्यू दोनों देशों की मित्रता का प्रतीक है। 'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' इसका प्रचलित नाम हो चुका है जबकि इस स्टेच्यू को जिस तौर पर फ्रांस ने भेंट किया था वह है - 'लिबर्टी इनलाइटिंग द वर्ल्ड'।

यह स्टेच्यू अमेरिका के न्यूयॉर्क हार्बर के लिबर्टी द्वीप पर स्थापित किया गया है। ताम्र पट्‍टिका से बनी यह मूर्ति 46 मीटर ऊँची है। इस मूर्ति की छोटी प्रतिकृति पेरिस में स्थापित है। इस मूर्ति में एक स्त्री को ढीला लबादा ओढ़े हुए दिखाया गया। मूर्ति के बाएँ हाथ में एक पट्‍टिका है और इस पट्‍टिका पर अमेरिकी स्वतंत्रता की तिथि 4 जुलाई 1776 अंकित है। दायाँ हाथ ऊपर की तरफ है और इसमें एक मशाल है। रात के समय इस मशाल को भीतर से प्रकाशमान किया जाता है। रात में यह स्टेच्यू न सिर्फ आकर्षण का केंद्र बन जाता है बल्कि जलयानों और वायुयानों के लिए स्थानीय संकेतक का काम भी करता है।

हीरा कौन? कोयला कौन?



हीरा है सदा के लिए, मेरा हीरा तुझे दे रही हूँ आदि अनेक विज्ञापन दिन भर हीरे के आकर्षण, बहुमूल्यता एवं महत्ता का परिचय देते रहते हैं। हीरा कितने ही साम्राज्यों के उत्थान पतन में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। कोहिनूर के जाने का गम हर एक भारतवासी के मन में आज भी उतना ही सालता है।

आखिर यह हीरा है क्या? कहाँ से आया? कैसे बना? कैसे बना? क्यों इतना चमकीला है? यह जानने के लिए हमें इसकी जन्म-पत्री देखनी होगी। आवर्त सारिणी के चौदहवें ग्रुप में पहला सदस्य है काला कलूटा कार्बन। हीरा इसी कार्बन का 'अपररूप' है। यदि हम आंध्रप्रदेश के गोलकुंडा क्षेत्र से मिलने वाले हीरों की बात करें तो ये हमें किंबर लाइट चट्‍टानों से प्राप्त होते हैं।

विभिन्न भौगोलिक परिवर्तनों के कारण अनेकों पेड़-पौधों के जमीन के अंदर भूगर्भ में समा जाने पर कुछ विशिष्ट परिस्थितियों का निर्माण होता है। वहाँ आक्सीजन का अभाव होता है। इन परिस्थितियों में पेड़-पौधों में उपस्थित कार्बन 'कोलीफिकेशन' की प्रक्रिया द्वारा हजारों लाखों वर्षों में 'कोल' (पक्का कोयला) में परिवर्तित हो जाता है। किंतु यदि वहाँ का ताप पंद्रह सौ डिग्री सेंटिग्रेट, दाब सत्तर हजार एटमास्कियर हो तो कुछ कार्बन हीरे में परिवर्तित हो जाता है।

अब भूगर्भ से किंबरलाइट चट्‍टान एक तीर की तरह सतह की ओर उठती है एवं अपने साथ हीरे के टुकड़े भी लेकर आती है। यदि इसकी रफ्तार पंद्रह किलोमीटर प्रति घंटे एवं भूगर्भ की गहराई पृथ्‍वी की ऊपरी सतह से एक सौ पचास किमी अंदर हो तो यह हीरों को पृथ्वी की ऊपरी सतह तक ले आती है और यही हीरे लोगों को प्राप्त होते हैं किंतु यदि रफ्‍तार, तापक्रम या चट्‍टान के 'ओरिजन' की गहराई में परिवर्तन आया तो हीरा, ग्रेफाइट या कार्बन में बदल जाता है।

पृथ्‍वी की सतह पर आया यह हीरा तराशने की निपुणतापूर्ण कठिन प्रक्रिया से गुजरता है तब उसका संसार को चकाचौंध करने वाला रूप सामने आता है।

विचारणीय बात यह है कि आखिर क्या संरचनात्मक फर्क है कि वही कार्बन एक परिस्थिति में हीरा बन जाता है वहीं दूसरी परिस्थिति में कोयला ग्रेफाइट? यह जानने के लिए हमें हीरे और ग्रेफाइट की आंतरिक संरचना समझनी होगी। कार्बन की संयोजकता या कहें अन्य परमाणुओं से संयुक्त होने वाले बिंदु चार होते हैं।

डायमंड के केस में ये चारों संयोजकताएँ कार्बन के अन्य परमाणुओं की चारों संयोजकताओं से संबद्ध होती हैं और अत्यंत कठोर सुदृढ़ प्यारा और संसार के सबसे अधिक दैदीप्यमान पदार्थ को जन्म देती है, किंतु ग्रेफाइट का अध्ययन करने पर पाया गया कि ग्रेफाइट के केस में कार्बन की चार संयोजकताओं में से एक भटक जाती है। एक कार्बन का परमाणु अन्यों के साथ सिर्फ तीन संयोजकताओं से जुड़ता है और अब कार्बन हीरा नहीं ग्रेफाइट बन जाता है जो ‍न विद्युत प्रवाह का विरोध कर पाता न उसमें उतनी सुदृढ़ता व कठोरता है न वह चमक न मूल्य, अब वह साधारण से आघात से टूटने वाला घूसर काले रंग का पदार्थ बन गया है।

क्या हम इसकी तुलना हमारे जीवन में चारों ओर दिखाई देने वाले दृश्यों के किस व्यक्ति से नहीं कर सकते? कल्पना कीजिए किसी परिवार में दो पुत्र हैं अत्यंत कठिन परिस्थितियों में उनका पालन पोषण हुआ है दोनों एक ही परिवार एक ही परिवेश में जन्मे एवं पले बढ़े हैं दोनों में बुद्धिमत्ता, अनुशासन, आत्मविश्वास एवं उच्च चरित्र के गुण हैं जो कार्बन की संयोजकता की तरह अन्य से जुड़ाव या व्यवहार में काम आते हैं।

अब यदि बुरी संगति या किसी अन्य कारण से एक भाई अपने चरित्र से गिर जाता है तो वह हीरे की ग्रेफाइट में बदलने जैसी प्रक्रिया है। एक स्वतंत्र संयोजकता के कारण हीरा ग्रेफाइट में और एक उच्च प्रभावशाली व्यक्तित्व सिर्फ एक गुण में उच्च श्रृंखला होने के कारण प्रभावहीन हो जाता है ऐसे उदाहरण हमें अनेक जगह देखने को मिलेंगे।

मुझे ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में जो भी घटित होता है चाहे वह व्यक्त्वि में हो, समाज में हो, व्यवहार में हो, प्रकृति में भी कहीं न कहीं हम वैसा ही कुछ होता है। हमारे जीवन को समान प्राकृतिक नियम नियंत्रित करते हैं। यदि हम विज्ञान के द्वारा इन नियमों को समझने की कोशिश में कामयाब हों तो हमें हमारी जिंदगी में आने वाली समस्त समस्याओं के हल मिल जाएँगे, सब अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर।

हमारी स्थिति उस अल्पज्ञ विद्यार्थी की तरह है जिसे परीक्षा कक्ष में प्रश्नपत्र के साथ पाठ्‍यपुस्तक भी थमा दी गई है लेकिन वह उत्तरों को पुस्तक में से ढूँढ नहीं पाता। यदि हम बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से ढूँढें तो हमारे हर प्रश्न का उत्तर प्रकृति के पास है।

कंप्यूटराइज्ड हो चुकी है ब्रेल की वर्णमाला

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उभरे हुए छह बिंदुओं से विशेष वर्णमाला तैयार कर लुई ब्रेल ने नेत्रहीनों के लिए एक वैश्विक लिपि तैयार की जिसमें कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के आने से पुस्तकों का प्रकाशन कार्य तेज हो चुका है।

भारत में नेत्रहीनों के लिए कई विशेष स्कूल हैं और अब तो ऊँची कक्षाओं में भी ब्रेल लिपि में किताबें उपलब्ध होने लगी हैं। गैरसरकारी संस्था नेशनल फेडेरशन ऑफ ब्लाइंड (एनएफबी) नेत्रहीनों के लिए किताबों का प्रकाशन और संग्रह करती है।

संस्था में कापीहोल्डर शिवपराग सिंह ने कहा, ‘विज्ञान और गणित की किताबें अब ऊँची कक्षाओं के लिए भी उपलब्ध होने लगी हैं। पहले अधिकतर नेत्रहीन आठवीं कक्षा तक ही पढ़ पाते थे जो अब किताबों की उपलब्धता के कारण 10वीं और आगे तक पढाई कऱने में भी सक्षम हैं।’ सिंह ने कहा कि कंप्यूटर में कार्य होने से विशेष कोड की संख्या बढ़ चुकी है। इन विशेष कोड में विशेष कैरेक्टरों का बड़ा संग्रह होता है जिनसे पुस्तकें तैयार होती हैं। इससे अब विविध विषयों में किताबें भी उपलब्ध होने लगी हैं।

उन्होंने कहा, ‘भारत की महत्वाकांक्षी शिक्षा परियोजना सर्व शिक्षा अभियान में भी नेत्रहीन बच्चों के लिए शिक्षा देने की व्यवस्था है। उनके लिए ब्रेल में किताबें तैयार की जा रही हैं।’ इस परिसंघ में 25 हजार से अधिक सदस्य हैं और इसे विश्व नेत्रहीन संघ की मान्यता प्राप्त है।

लुई के स्कूल में कुल 14 किताबें थी और उन्होंने सारी पढ़ डालीं। उन्होंने महसूस किया कि नेत्रहीनों की पढ़ाई में काफी परेशानियाँ हैं। इसके बाद उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया कि नेत्रहीनों के लिए ऐसी व्यवस्था बनानी है जिससे वे अपनी उंगली की मदद से पढ़ सके। 

उन्होंने छह बिंदुओं (डाट्‍स) की मदद से ऐसी वर्णमाला बनाई जिसे छूकर नेत्रहीन भी पढ़ सकते थे। पूरे विश्व में इस विशेष वर्णमाला में कई किताबें आ चुकी हैं।

एनएफबी में कार्यरत अतुल ने कहा कि पहले ब्रेल में किताबों को तैयार करने का काम हाथ से होता था लेकिन कंप्यूटर आने के बाद से पुस्तकों के प्रकाशन में तेजी आई है।

सिंह ने कहा कि इन विशेष प्रकार की पुस्तकों के प्रकाशन और संग्रह में नेत्रहीन भी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। प्रूफ रीडर का काम तक वह देख सकते हैं। दिन प्रति दिन प्रगति से नेत्रहीनों का स्वावलंबन बढ़ता जा रहा है।

कैसे विलुप्त हुए डायनासोर

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छह करोड़ 50 लाख साल पहले क्या हुआ था? हम-आप शायद इस सवाल का जवाब देने में घंटों सिर घुजाते रहें लेकिन शंकर चटर्जी इस सवाल का जवाब खोज चुके हैं। शंकर चटर्जी कोलकाता के रहने वाले हैं और अमेरिका की टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी में भू-तत्व के प्राध्यापक हैं। पिछले साल अक्टूबर में उन्होंने इसी सवाल को लेकर पोर्टलैंड में जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ अमेरिका के वार्षिक सम्मेलन में कई व्याख्यानें दीं और उसके बाद से दुनिया भर के वैज्ञानिकों में खलबली है। छोटे से इस सवाल का उन्होंने कुछ लंबा जवाब रखा - अंतरिक्ष से 40 किलोमीटर के व्यास वाला एक पिंड पृथ्वी से भारत के हिस्से में आ टकराया था जिससे हाइड्रोजन बम विस्फोट से 10 हजार गुना अधिक असर हुआ।

सुनामी आई और पृथ्वी पर कई ज्वालामुखी फट पड़े। महीनों तक आसमान में गैस की परतें छाई रहीं-अँधेरा छाया रहा। इतने दिनों तक सूर्य की किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुँच सकीं और चरम खाद्य संकट आ खड़ा हुआ। ऐसे में भुखमरी के चलते पृथ्वी के भारी-भरकम जीव नष्ट हो गए।

शंकर चटर्जी के इस शोध ने डायनासोरों के नष्ट होने को लेकर वैज्ञानिकों की अब तक की मान्यता ध्वस्त कर दी है। अब तक माना जा रहा था कि शिकागो या मेक्सिकों में बने हजारों किलोमीटर के व्यास वाले गड्‍ढे ही डायनासोरों के लुप्त होने के प्रमाण हैं। इन जगहों पर अंतरिक्ष से पिंड टकराए और हजारों हाइड्रोजन बमों के समान बनी ऊर्जा में डायनासोर के लुप्त होने के तीन लाख साल पहले अस्तित्व में आए। अब चटर्जी की थ्योरी है कि अंतरिक्ष से गिरा पिंड दरअसल, भारत के पश्चिमी हिस्से से टकराया था जिससे बने क्रेटर का नाम उन्होंने शिवा क्रेटर रखा। अरब सागर के नीचे स्थित इसी शिवा क्रेटर के ऊपर स्थित है बॉम्बे हाई। शिवा क्रेटर का रहस्य खुलने के साथ ही डायनासोरों के लुप्त होने को लेकर नई थ्योरी बनी है।

अपनी थ्‍योरी से रातोंरात चर्चित हो उठे शंकर चटर्जी अपनी पत्नी शिवानी के साथ हाल में भारत की यात्रा पर थे। दो-तीन महीने पहले वे कोलकाता में थे। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय, इंडियन स्टैटिकल इंस्टीट्‍यूट, जादवपुर यूनिवर्सिटी आदि कई जगहों पर शोधपत्र पढ़े। उन्होंने भारत और विदेशों में डायनासोरों के जीवाश्म खोजने के अपने अनुभवों के बारे में जानकारी दी।

जिओलॉजी की भाषा में उस युग को क्रिटाशियस युग कहा जाता है। इसके बाद का युग था टरशियरी। दोनों युगों के संधिकाल को वैज्ञानिक के-टी एक्सटींक्शन कहते हैं। दोनों युगों के संधिकाल में 70 फीसदी से अधिक डायनासोर नष्ट हुए। कल्पना कीजिए, अगर साढ़े छह करोड़ साल पहले उल्कापात नहीं हुआ होता तो क्या होता? पृथ्वी पर 10 करोड़ साल तक राज करने वाले डायनासोरों के जीवाश्म अब भी उस युग की कहानियाँ सुनाते हैं।

उस युग में डायनासोर युग के खात्मे को लेकर दुनियाभर में 1980 के बाद माना जाने लगा कि अंतरिक्ष से कुछ पृथ्‍वी से टकराया और उसके चलते डायनासोर और बड़े जीव नष्ट हुए। इससे पहले माना जा रहा था कि काल के स्वाभाविक प्रवाह में जीवों के स्वरूप बदलते गए या जीव नष्ट होते गए और नई प्रजातियाँ पैदा होती गईं। सन् 1980 के दौर में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के चार वैज्ञानिकों वाल्टर अलवरेज, नोबेल पुरस्कार विजेता लुई अलवरेज, फ्रैंक आसारो और हेलेन मिशेल ने इटली के समुद्रतटीय इलाके में खनन में 30 फीसदी से ज्यादा इरीडियम पाया। यह इरीडियम कहाँ से आया।

वैज्ञानिकों ने खोजबीन में पाया कि यहाँ धूमकेतु या उल्कापिंड गिरा होगा। इन वैज्ञानिकों ने सिद्धांत दिया कि ज्वालामुखियों के लावा से डायनासोर नष्ट नहीं हुए बल्कि धूमकेतु या उल्का के आघात से नष्ट हुए। इसके बाद सवाल आया कि डायनासोरों को लुप्त करने वाले गड्‍ढे कहाँ बने? इसका जवाब भारतीय मूल के वैज्ञानिक शंकर चटर्जी के शोधों से दुनिया को मिल गया। उनके शोध की शुरुआत कोलकाता के इंडियन स्टैटिकल इंस्टिट्‍यूट से है।

अपने सहयोगी धीरजकुमार रुद्र के सात उन्होंने डायनासोरों के लुप्त होने की पुरानी थ्योरी अर्थात ज्वालामुखी लावा के चलते नष्ट होने की राह पर शोध शुरू किया।

दुनिया भर के वैज्ञानिक ज्वालामुखी लावा वाले चट्‍टानों पर शोध करने के लिए भारत का ही रुख करते हैं। वैज्ञानिक शंकर के अनुसार मुंबई से जबलपुर तक रास्ते भर जो चट्‍टानें मिलती हैं, वे लावा पत्थर ही तो हैं। पूरा पश्चिमी घाट लावा से निर्मित है। अजंता-एलोरा के पत्थर भी वही हैं। 1920 में मध्य भारत में ऐसे ही पत्थरों के बीच डायनासोर का पहला कंकाल मिला था। उसे लंदन के म्यूजियम में रखा गया है।

शंकर चटर्जी के अनुसार, 1980 में नेशनल ज्योग्रॉफिक से ग्रांट पाकर वे अपनी पत्नी के साथ जबलपुर से एक्सपीडिशन पर गए। 1920 में जहाँ से कंकाल मिला था, उसी जगह। उस जगह खुदाई करने पर कई डायनासोर के कंकाल मिले। अंडों के अवशेष भी मिले। वहाँ इरीडिम और क्वार्ज मेटल की मात्रा बेहद ज्यादा मिली।

7जाहिर है, यह जगह पृथ्वी के बाहर से आए किसी चीज के आघात से बनी थी। इसके बाद क्वार्ज मेटल की छानबीन करते-करते शंकर, उनकी पत्नी और अन्य गणवेशक बॉम्बे हाई तक पहुँचे जिसका गठन छह करोड़ 60 लाख साल पहले बताया जाता है।