Stories

A little Indian Boy

 A little Indian Boy wanted Rs50, so he prayed 4 weeks, but nothing happened.
Finally he decided 2 write a letter 2 God requesting Rs50.

When post office staff received a letter addressed 2 God, they forwarded it 2 the President.

... ... President was so amused, she instructed her secretary 2 send the little boy Rs 20.
As she thought Rs50 would be a lot of
money for him.

The little boy was delighted with Rs20 & decided 2 write a thank u note 2 God.


'Dear God, Thank u very much 4 sending d money. However,
I noticed dat u ev sent it through 'Rashtrapati Bhavan' (Through Government Building) & those corrupt donkeys ate my 30 rupees! :D'

Hope U Will Share It Too And thus Give Your Friends Some Good Laugh :p



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Appreciate what you have !

One day . . . a wealthy family man took his son on a trip to the country, so he could have his son see how poor country people live.

They stayed one day and one night in the home of a very humble farmer.   At the end of the trip, and when they were back home, the father asked his son, "What did you think of the trip?"

The son replied, "Very nice dad."

Then the father asked his son, "Did you notice how poor they were?"

The son replied, "Yes."

The father continued asking, "What did you learn?"

The son responded, "I learned that we have one dog in our house, and they have four. 

Also, we have a fountain in our garden, but they have a stream that has no end. 

And we have imported lamps in our garden . . . where they have the stars! 

And our garden goes to the edge of our property.   But they have the entire horizon as their back yard!"

At the end of the son's reply the father was speechless. 

His son then said, "Thank you dad for showing me how poor we really are."

Isn't it true that all depends on the lens you use to see life?

One can ask himself what would happen if we give thanks for what we have instead of always asking for more.

Learn to appreciate what you have. Wealth is all in one's point of view.


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 एक भारतीय सियाचिन सैनिक का अपनी मरी हुई माँ को लिखा हुआ खत-

प्रणाम माँ,
माँ बचपन में मैं जब भी रोते रोते
सो जाया करता था तो तू चुपके से मेरे
सिरहाने खिलोने रख दिया करती थी और
कहती थी की ऊपर से एक परी ने आके रखा
है और कह गई है की अगर मैं फिर कभी रोया तो और
खिलोने नहीं देगी ! लेकिन इस मरते हुए देश का सैनिक बनके रो तो मैं आज भी रहा हूँ पर अब ना तू आती है और ना तेरी परी ! परी क्या .. यहाँ ढाई हजार मीटर ऊपर तो परिंदा भी नहीं मिलता !

मात्र कुछ हज़ार रुपए के लिए मुझे कड़े अनुशासन में रखा जाता है, लेकिन वो अनुशासन ना इन भ्रष्ट नेताओं के लिए है और ना इन मनमौजी देशवासियों के लिए !

रात भर जगते तो हम भी हैं लेकिन अपनी देश के सुरक्षा के लिए लेकिन वो जगते हैं लेट नाईट पार्टी के लिए !
हम इस -12 डिग्री में आग जला के अपने आप को गरम करते हैं . लेकिन हमारे देश के नेता हमारे ही पोशाकों, कवच, बन्दूकों, गोलियों और जहाजों में घोटाले करके अपनी जेबे गरम करते हैं !

आतंकियों से मुठभेड़ में मरे हुए सैनिकों की संख्या को न्यूज़ चैनल नहीं दिखाया जाता लेकिन सचिन के शतक से पहले आउट हो जाने को देश के राष्टीय शोक की तरह दिखाया जाता है !

हर चार-पांच सालों ने हमें एक जगह से दुसरे जगह उठा के फेंक दिया जाता है लेकिन यह नेता लाख चोरी करलें बार बार उसी विधानसभा - संसद में पहुंचा दिए जाते हैं ! मैं किसी आतंकी को मार दूँ तो पूरी राजनितिक पार्टियां वोट के लिए उसे बेकसूर बना के मुझे कसूरवार बनाने में लग जाती हैं लेकिन वो आये दिन अपने अपने भ्रष्टाचारो से देश को आये दिन मारते हैं,

कितने ही लोग भूखे मरते हैं, कितने ही किसान आत्महत्या करते हैं, कितने ही बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं. लेकिन उसके लिए इन नेताओं को जिम्मेवार नहीं ठहराया जाता.

निचे अल्पसंख्यको के नाम पर आरक्षण बाटा जा रहा है लेकिन आज तक मरे हुए शहीद सैनिकों की संख्या के आधार पर कभी किसी वर्ग को आरक्षण नहीं दिया गया.

मैं दुखी हूँ इस मरे हुए संवेदनहीन देश का सैनिक बनके ! यह हमें केवल याद करते हैं 26 जनवरी को और 15 अगस्त को ! बाकी दिन तो इनको शाहरुख़, सलमान, सचिन, युवराज की फ़िक्र रहती है !

हमारी हालत ठीक वैसे ही उस पागल किसान की तरह है जो अपने मरे हुए बेल पर भी कम्बल डाल के खुद ठंड में ठिठुरता रहता है ! मैंने गलती की इस देश का रक्षक बनके !

तू भगवान् के ज्यादा करीब है तो उनसे कह देना की अगले जन्म में मुझे अगर इस देश में पैदा करे तो सेनिक ना बनाए और अगरसैनिक बनाए तो इस देश में पैदा ना करे !

यहाँ केवल परिवार वाद चलता है, अभिनेता का बेटा जबरदस्ती अभिनेता बनता है और नेता का बेटा जबरदस्ती नेता!

प्रणाम-
xxx सिंह (मरे हुए देश का जिन्दा सेनिक) !
भारतीय सैनिक

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माँ का खत

बस से उतरकर.. जेब में हाथ डाला, मैं चौंक पड़ा.., जेब कट चुकी थी..। जेब में.. था भी क्या..? कुल 150 रुपए और एक खत..!! जो मैंने अपनी माँ को लिखा था कि - मेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…। तीन दिनों से.. वह पोस्टकार्ड मेरी जेब में पड़ा था। पोस्ट.. करने को.. मन ही.. नहीं कर रहा था। 150 रुपए जा चुके थे..। यूँ 150 रुपए ..कोई बड़ी रकम नहीं थी., लेकिन.. जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए.. 150 रुपए.. 1500 सौ से कम नहीं होते!! कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व.. मैं सहम गया..। जरूर.. पैसे भेजने.. को लिखा होगा..। …लेकिन, खत पढ़कर.. मैं हैरान.. रह गया।


माँ ने लिखा था — “बेटा, तेरा 500 रुपए का.. भेजा हुआ मनीआर्डर.. मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे !…पैसे भेजने में.. कभी लापरवाही.. नहीं बरतता..।” मैं इसी.. उधेड़-बुन में लग गया.. कि आखिर.. माँ को मनीआर्डर.. किसने भेजा होगा..? कुछ दिन बाद., एक और पत्र मिला। चंद लाइनें लिखी थीं—आड़ी- तिरछी..। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया..। लिखा था — “भाई, 150 रुपए तुम्हारे.. और 350 रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को.. मनीआर्डर.. भेज दिया है..। फिकर.. न करना। माँ तो सबकी.. एक- जैसी ही होती है न..!! वह क्यों भूखी रहे...?? तुम्हारा— जेबकतरा भाई..!!! दुनियां में.. आज भी.. माँ को प्यार.. करने वाले.. ऐसे इन्सान.. हैं..!!! यदि आप भी.. अपनी माँ.. को इतना ही प्यार.. करते हैं...!! तो भावुकता में.. आंसू.. वाहने के वजाय.. इस कहानी को Share करो...

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तीन सवाल :: अकबर बीरबल

महाराजा अकबर, बीरबल की हाज़िरजवाबी के बडे कायल थे. उनकी इस बात से दरबार के अन्य मंत्री मन ही मन बहुत जलते थे. उनमें से एक मंत्री, जो महामंत्री का पद पाने का लोभी था, ने मन ही मन एक योजना बनायी. उसे मालूम था कि जब तक बीरबल दरबार में मुख्य सलाहकार के रूप में है उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती.

एक दिन दरबार में अकबर ने बीरबल की हाज़िरजवाबी की बहुत प्रशंसा की. यह सब सुनकर उस मंत्री को बहुत गुस्सा आया. उसने महाराज से कहा कि यदि बीरबल मेरे तीन सवालों का उत्तर सही-सही दे देता है तो मैं उसकी बुद्धिमता को स्वीकार कर लुंगा और यदि नहीं तो इससे यह सिद्ध होता है की वह महाराज का चापलूस है. अकबर को मालूम था कि बीरबल उसके सवालों का जवाब जरूर दे देगा इसलिये उन्होंने उस मंत्री की बात स्वीकार कर ली.


उस मंत्री के तीन सवाल थे -

१. आकाश में कितने तारे हैं?
२. धरती का केन्द्र कहाँ है?
३. सारे संसार में कितने स्त्री और कितने पुरूष हैं?

अकबर ने फौरन बीरबल से इन सवालों के जवाब देने के लिये कहा. और शर्त रखी कि यदि वह इनका उत्तर नहीं जानता है तो मुख्य सलाहकार का पद छोडने के लिये तैयार रहे.

बीरबल ने कहा, "तो सुनिये महाराज".

पहला सवाल - बीरबल ने एक भेड मँगवायी. और कहा जितने बाल इस भेड के शरीर पर हैं आकाश में उतने ही तारे हैं. मेरे दोस्त, गिनकर तस्सली कर लो, बीरबल ने मंत्री की तरफ मुस्कुराते हुए कहा.

दूसरा सवाल - बीरबल ने ज़मीन पर कुछ लकीरें खिंची और कुछ हिसाब लगाया. फिर एक लोहे की छड मँगवायी गयी और उसे एक जगह गाड दिया और बीरबल ने महाराज से कहा, "महाराज बिल्कुल इसी जगह धरती का केन्द्र है, चाहे तो आप स्व्यं जाँच लें". महाराज बोले ठीक है अब तीसरे सवाल के बारे में कहो.

अब महाराज तीसरे सवाल का जवाब बडा मुश्किल है. क्योंकि इस दुनीया में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना तो स्त्री की श्रेणी में आते हैं और ना ही पुरूषों की श्रेणी. उनमें से कुछ लोग तो हमारे दरबार में भी उपस्थित हैं जैसे कि ये मंत्री जी. महाराज यदि आप इनको मौत के घाट उतरवा दें तो मैं स्त्री-पुरूष की सही सही संख्या बता सकता हूँ. अब मंत्री जी सवालों का जवाब छोडकर थर-थर काँपने लगे और महाराज से बोले,"महाराज बस-बस मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया. मैं बीरबल की बुद्धिमानी को मान गया हूँ".

महाराज हमेशा की तरह बीरबल की तरफ पीठ करके हँसने लगे और इसी बीच वह मंत्री दरबार से खिसक लिया.

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तेनालीराम का इम्तिहान

मुगल बादशाह बाबर ने अपने दरबारियों से तेनाली राम की बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दरबारी ने कहा, "आलमपनाह, तेनाली राम की हाजिर-जवाबी और अक्लमंदी बेमिसाल है।" बाबर इस बात की सत्यता परखना चाहता था।

उसने राजा कृष्णदेव राय को एक पत्र भेजा, जिसमें उसने प्रार्थना की कि तेनाली राम को एक मास के लिए दिल्ली भेज दिया जाए, जिससे उसकी सूझबूझ का नमूना बादशाह खुद देख सकें। कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को विदा करते समय कहा, "तुम्हारी सूझबूझ और बुद्धिमानी की परीक्षा का समय आ गया है। जाओ और अपना कमाल दिखाओ। अगर तुम पुरस्कार ले आए तो मैं भी तुम्हें एक हजार स्वर्ण मुद्राएं दूंगा। और अगर तुम पुरस्कार न प्राप्त कर सके तो मैं तुम्हारा सिर मुंडवाकर दरबार से बाहर निकाल दूंगा।"


तेनाली राम के दिल्ली पहुंचने की सूचना जब बाबर को मिली तो उसने अपने दरबारियों से कहा, "हम इस आदमी का इम्तिहान लेना चाहते हैं। मेरी ताकीद है कि आप लोग इसके मजाकों पर न हंसें। यह आदमी यहां से आसानी से इनाम हासिल करके न जाने पाए।"

दरबार में पहुंचकर तेनाली राम ने अपनी बातों से बादशाह और दरबारियों को हंसाने का प्रयत्न किया। यह क्रम पंद्रह दिन तक चलता रहा, लेकिन कोई न हंसा। सोलहवें दिन से तेनालीराम ने दरबार जाना छोड़ दिया।

एक दिन बाबर रोज की तरह सैर को निकला। साथ में एक नौकर था, जिसके हाथ में अशर्फियों की थैलियां थीं। बादशाह ने देखा कि सड़क के किनारे एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति खोदकर उसमें आम का पौधा लगा रहा है। उस व्यक्ति की कमर झुकी हुई थी। बाबर ने उसके पास जाकर कहा, "बूढ़े मियां, यह क्या कर रहे हो?"

"आम का पेड़ लगा रहा हूं। इस इलाके में यह पेड़ कम पाया जाता है। इसलिए अच्छी बिक्री होगी।" बूढ़े ने कहा। "लेकिन आपकी उमर तो काफी अधिक है। इस पेड़ के फल खाने के लिए आप तो होंगे नहीं। फिर इस मेहनत से क्या फायदा?" बाबर ने कहा।

"आलमपनाह, मेरे अब्बाजान ने जो पेड़ लगाए थे, उनके फल मुझे खाने को मिले। इसी तरह मेरे लगाए हुए पेड़ के आम कोई और खाएगा। जब मेरे लिए अब्बाजान ने पेड़ लगाए, तो मैं दूसरों की खुशी के लिए ऐसा क्यों न करूं?" बूढ़ा बोला।

"हमें आपकी बात पसंद आई।" बाबर के कहते ही नौकर ने सौ अशर्फियों की थैली बूढ़े को दे दी। "बादशाह सलामत बहुत मेहरबान हैं।" बूढ़े ने कहा, "सब लोग पेड़ के बड़े होने पर फल खाते हैं पर मुझे इसे लगाने से पहले ही फल मिल गया है। दूसरों की भलाई करने के विचार का नतीजा ही कितना अच्छा होता है।"

"बहुत खूब!" बाबर के इशारा करते ही नौकर ने एक और थैली उसे भेंट कर दी। बूढ़ा फिर बोला, "बादशाह सलामत की मुझ पर बड़ी मेहरबानी है। यह पेड़ जब जवान होगा तो साल में एक बार फल देगा पर, आलमपनाह ने तो इसे लगाने के दिन ही दो बार मेरी झोली भर दी।"

बाबर ने इस बार भी खुश होकर उसे एक थैली देने का आदेश दिया और हंसते हुए अपने नौकर से कहा कि चलो यहां से नहीं तो यह बूढ़ा हमारा खजाना खाली कर देगा। "एक पल इंतजार कीजिए आलमपनाह," कहते हुए बूढ़े ने अपने कपड़े उतार दिए।

तेनालीराम को अपने सामने देखकर बाबर बहुत हैरान हुआ। तेनालीराम ने फिर कहा, "बादशाह सलामत बहुत मेहरबान हैं। तेनालीराम ने कुछ ही देर में आलमपनाह से तीन बार ईनाम पा लिया है।"

बाबर ने कहा, "तेनालीराम तुम्हें ईनाम देकर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है। तुमने इसे हासिल करने के लिए बहुत समझदारी से काम लिया है।" तेनालीराम वापस विजय नगर आया। राजा ने सारी कहानी सुनकर उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं ईनाम में दिए।

(साभार: तेनालीराम का हास-परिहास, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)


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हमारे राज्य में कौए कितने हैं?

एक दिन अकबर अपने मत्रीं बीरबल के साथ अपने महल के बाग में घूम रहे थे. बीरबल बागों में उडते कौओं को देखकर कुछ सोचने लगे और बीरबल से पूछा, "क्यों बीरबल, हमारे राज्य में कितने कौए होंगे?"

बीरबल ने कुछ देर अंगुलियों पर कुछ हिसाब लगाया और बोले, "हुज़ूर, हमारे राज्य में कुल मिलाकर १,११, ९८७ कौए हैं".

"तुम इतना विश्वास से कैसे कह सकते हो?", अकबर बोले.

"हुज़ूर, आप खुद गिन लिजीये", बीरबल बोले.


अकबर को कुछ इसी प्रकार के जवाब का अंदेशा था. उन्होंने ने पूछा, "बीरबल, यदि इससे कम हुए तो?"

"तो इसका मतलब है कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गये हैं. और यदि ज्यादा हुए तो? तो इसका मतलब यह हैं हु़जूर कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने हमारे राज्य में आये हैं", बीरबल ने मुस्कुरा कर जवाब दिया.

अकबर एक बार फिर मुस्कुरा कर रह गये.

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